एक बहन की रक्षा कर ली तो पर्व की सार्थकता – अणुवत्सजी राग के पर्व में भी वैराग्य को तलाशें व उसे अपनाए – संयतमुनिजी आत्मरक्षा का संकल्प ही रक्षाबंधन का महत्व …. संयतमुनिजी
एक बहन की रक्षा कर ली तो पर्व की सार्थकता – अणुवत्सजी
राग के पर्व में भी वैराग्य को तलाशें व उसे अपनाए – संयतमुनिजी
आत्मरक्षा का संकल्प ही रक्षाबंधन का महत्व …. संयतमुनिजी
निलीमा डाबी
थांदला। लौकिक व लोकोत्तर ये दो प्रकार के पर्व में रक्षा बंधन लौकिक पर्व है। प्राचीन काल से ही इस दिन बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती आ रही है व भाई बहन की रक्षा का वचन देता आ रहा है। इस पर्व की शुरुआत को लेकर अनेक कथा प्रचलित है पर मूल में तो भाई बहन के पवित्र रिश्तें व एक दूसरे के प्रति रक्षा के भाव ही होते है। उक्त बातें धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए अणुवत्स पूज्य श्री संयतमुनिजी म.सा. ने कही। पूज्यश्री ने कहा कि यह तो लौकिक पर्व है पर इस पर्व की भी अपनी विशेषता है। ऐसे में यदि कोई भाई किसी भी एक बहन की रक्षा कर लेता है तो इस पर्व की सार्थकता है। ऐसे ही इस पर्व पर धर्म दृष्टि से एक कथा प्रचलित है जब छः खण्ड के अधिपति महा पद्मनाभ चक्रवर्ती किसी बात से खुश होकर अपने मंत्री नमुचि को 7 दिन के लिए राजा बना देते है ऐसे में नमुचि सत्ता का दुरुपयोग करते हुए जैन मुनियों पर द्वेष रखते हुए उन्हें राज्य से निष्काषित कर देते है यह बात चक्रवर्ती राजा के भाई विष्णु मुनि को पता चलती है तब वे नमुचि के पास आते है व तीन पैर भूमि मांगते है व वैक्रिय शरीर बनाकर दो पैर में आकाश व पाताल नाप लेते है तब तीसरा पैर नमुचि के सिर पर रखते है ऐसे में नमुचि को अपनी गलती का एहसास होने पर उसे क्षमा कर देते है। इस तरह विष्णु मुनि ने धर्म की रक्षा करते हुए जैन मुनियों की जान बचाई। इसी तरह धर्म की रक्षा का संकल्प इस पर्व की सार्थकता है। पूज्यश्री ने कहा कि राग के पर्व पर वैराग्य के भाव ग्रहण करें जैसे अपनी आत्मा समान सभी को समझे व आत्म रक्षा के लिए छःकाय जीवों की रक्षा का प्रयास करें तभी लौकिक पर्व भी आत्मोत्कर्ष के पर्व बन सकते है। इस अवसर पर मधुर व्यख्यानी पूज्य श्री आदित्यमुनिजी ने धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि जीव रक्षा के भाव पर्व को महत्वपूर्ण बनाते है यही से वह धर्म में प्रवेश पाता है। पूज्यश्री धार्मिक जीवों की विशेषता पर प्रवचन फरमाते हुए उनके सौम्यता रूपी गुण का विवेचन फरमाया। पूज्यश्री ने कहा कि हँसना मोहनीय कर्म की प्रकृति है व कर्म बंध का कारण है जबकि प्रसन्नता आत्मा का स्वभाव है। मन की प्रसन्नता धर्म में प्रवेश पाने पर ही कायम रहती है इसलिए इस स्वाभाविक दशा को आत्मसात करें तभी हम सुखी बनेंगें।
एक साथ 5 तपस्वियों ने लिए मासक्षमण के प्रत्याख्यान
थांदला नगर में तपस्या की बहार आई हुई है। अणु बगिया मासक्षमण, श्रेणी तप, लघु सर्वतो भद्र तप, सिद्धि तप व वर्षीतप आदि विविध तप से महक रही है। जानकारी देते हुए संघ प्रवक्ता पवन नाहर ने बताया कि आज की धर्म सभा में बाल तपस्वी भविक विवेक चौधरी व फेंक कुशाग्र चौधरी ने 4 उपवास, जहाँ 71 वर्षीतप आराधकों ने उपवास, 55 के लगभग सिद्धि तपस्वियों ने छठ के तेले तप के प्रत्याख्यान ग्रहण किये वही प्रांजल जिनेन्द्र लोढ़ा, अंकित भरत भंसाली, प्रदीप चंपालाल व्होरा, कु प्रिया महेश व्होरा, श्रीमती दीपा गौरव शाहजी ने दीर्घ मासक्षमण (31 उपवास) के प्रत्याख्यान ग्रहण किये इसी के साथ पुखराज बहन व्होरा ने श्रेणी तप, किरण बहन छाजेड़ ने लघु सर्वतो भद्र तप के साथ अन्य तपस्वियों ने भी विविध तप के प्रत्याख्यान ग्रहण किये। उल्लेखनीय है कि जिन शासन गौरव पूज्य श्री उमेशमुनिजी म.सा. “अणु” के दिव्य आशीष व वर्तमान प्रवर्तक पूज्य श्री जिनेन्द्रमुनिजी म.सा. के आज्ञानुवर्ती अणुवत्स पूज्य श्री संयतमुनिजी म.सा. आदि ठाणा – 4 व मधुर व्यख्यानी पूज्या श्री निखिलशीलाजी म.सा. आदि ठाणा – 4 के पावन सानिध्य में धर्म धरा थांदला में तपस्या के ठाठ लगे हुए है। अभी तक स्वीटी मनीज जैन (33), श्रीमती प्रेरणा आयुष व्होरा (31), श्रीमती सपना प्रदीप व्होरा (30) के मासक्षमण पूर्ण हो चुके है वही आज 5 तपस्वी ने भी मासक्षमण के प्रत्याख्यान ग्रहण किये तो राजेन्द्र श्रीमाल व अशोक तलेरा ने भी 23 उववास के प्रत्याख्यान ग्रहण कर मासक्षमण के भाव स्प्ष्ट कर दिए है। सभी तप आराधकों के निमित्त संघ द्वारा जयकार यात्रा निकाली जा रही है वही रिश्तेदार व परिवार द्वारा चौवीसी, प्रभावना व स्वधर्मी वात्सल्य का लाभ लिया जा रहा है। श्रीसंघ अध्यक्ष भरत भंसाली व सचिव प्रदीप गादिया ने भी इस वर्षावास को ऐतिहासिक बनाने के लिए सभी सदस्यों से ज्ञान दर्शन चारित्र की आराधना के साथ तपस्या की भेंट देने का आग्रह किया है।