हिंदी दिवस पर विशेष *स्वाभिमान और गर्व की भाषा है हिन्दी – ममता भट्ट*

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हिंदी दिवस पर विशेष *स्वाभिमान और गर्व की भाषा है हिन्दी – ममता भट्ट*

निलीमा डाबी

हिंदी की जननी संस्कृत भाषा है संस्कृत का सरल रूप ही हिंदी है हमारी भाषा पूर्णतः वैज्ञानिक भाषा है हर बिंदी और उच्चारण के मामूली अंतर से अर्थ बदल जाता है हिन्दी ने हमें विश्व में एक नई पहचान दिलाई है। हिन्दी विश्व में बोली जाने वाली प्रमुख भाषाओं में से एक है। विश्व की प्राचीन, समृद्ध और सरल भाषा होने के साथ-साथ हिन्दी हमारी ‘राष्ट्रभाषा’ भी है। यह भाषा है हमारे सम्मान, स्वाभिमान और गर्व की। हम आपको बता दें कि *हिन्दी भाषा विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली तीसरी भाषा है।*
भारत की स्वतंत्रता के बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एकमत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी की खड़ी बोली ही भारत की राजभाषा होगी। हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर सन् 1953 से संपूर्ण भारत में प्रतिवर्ष 14 सितंबर को ‘हिन्दी दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा। और फिर
धीरे-धीरे इस भाषा ने अंतरराष्ट्रिय भाषा का रूप ले लिया। अब हमारी राष्ट्रभाषा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बहुत पसंद की जाती है। इसका कारण कि यह भाषा हमारे देश की संस्कृति और संस्कारों का प्रतिबिंब है। आज विश्व के कोने-कोने से विद्यार्थी हमारी भाषा सीखने आते है ,तो फिर हर एक हिंदुस्तानी को तो गर्व होना ही चाहिए हिन्दी भाषा पर।
राष्ट्रभाषा किसी भी देश की पहचान और गौरव होती है। इस हेतु हम 14 सितंबर के दिन को ‘हिन्दी दिवस’ के रूप में मनाते हैं।
लेकिन आज बदलते युग के साथ अंग्रेजी ने भारत की जमीं पर अपने पांव जमा लिए औरअब यह विडंबना देखो कि आज हमारी राष्ट्रभाषा को हमें एक दिवस के रूप मे मनाना पड़ रहा है। भार‍त में रहकर हिन्दी को महत्व न देना भी हमारे लिए दुखद है।
वर्तमान मेअंग्रेजी बाजार में हिंदी पिछड़ती हुई महसूस होती है।
हम हमारे ही देश में अंग्रेजी के गुलाम बन बैठे हैं ।। आज प्रत्येक माता-पिता अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा के लिए अच्छे स्कूल में प्रवेश दिलाते हैं, और दिलाना भी चाहिए लेकिन इसके लिए मातृ भाषा को निचले पायदान पर रख देना ये किसी भी देश के भविष्य के लिए उचित नही। हिंदी अनिवार्य भाषा होनी ही चाहिए फिर देश का कोई भी राज्य का कोई भी विद्यालय क्यो न हो। ।चूकिं अंग्रेजी एक वैश्विक भाषा के रूप मे प्रचलित है, और इसमें कोई शक भी नही की बेशक उसने दुनिया को जोड़ने का कार्य सरल ही किया है, अतः अग्रेजी सीखना या बोलना कोई गुनाह या अपराध नही,लेकिन राष्ट्र और देश की भाषा को उसकी जगह दे देना ये वाकई में देश के प्रति गुनाह है । हमें इस हिंदी की विरासत को बचा कर आगामी पीढ़ियों को सौपना ही होगा लेकिन उनसे बिना कुछ छीने क्योकि युवा पीढी इतनी भी भावना शून्य और ना समझ नही जितना कि आजकल हम उन्हे समझते है,। सच मानिये उनमे भी देश प्रेम की उतनी ही भावना है जितनी हमारे भीतर फर्क इतना ही है कि वो उसे साझा करने मे असमर्थ महसूस करते है, क्योकि उनकी जुबां जितनी सरलता से अग्रेजी बोल पाती है उतनी हिंदी नही,,और यही बदलाव हमे लाना कि वो अपनी भावनाओ को अपनी भाषा मे साझा करने मे सहजता महसूस करे और ऐसा बदलाव लाना समाज और शैक्षणिक संस्थाओ की बड़ी जिम्मेदारी है,। हम आनेवाली पीढ़ी को अपनी भाषा के प्रति प्रेम और उसके मुल्यो की कीमत को समझायेंगे तो निश्चित ही एक दिन वो भी गर्व से कहेंगे की “हिंदी है, हम वतन है” और ये किसी और की नही हमारी अपनी ही जिम्मेदारी है, और निभानी तो सभी को पड़ेगी।

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