थांदला। जैन धर्म में तप त्याग को सिद्धत्व का प्रमुख द्वारा माना गया है ऐसे में चातुर्मास काल में जैन समाज में तपस्या का विशेष माहौल रहता है। धर्म धरा थांदला में जिन शासन गौरव” आचार्य भगवंत पूज्य गुरुदेव श्री उमेशमुनिजी म. सा. “अणु” के सुशिष्य धर्मदास गणनायक प्रवर्तक बुद्धपुत्र पूज्य गुरुदेव श्री जिनेंद्रमुनिजी म. सा. के आज्ञानुवर्ती अणुवत्स पूज्य श्री संयतमुनिजी म. सा. आदि ठाणा – 4 एवं पुण्यपुंज पूज्या श्री निखिलशीलाजी म. सा. आदि ठाणा- 4 के सानिध्य में “आत्मोत्कर्ष वर्षावास में तपस्या की बहार आई हुई है। चातुर्मास पूर्व से ही यहाँ 71 वर्षीतप आरधक वार्षिक आराधना कर रहे है वही 10 मासक्षमण, 2 श्रेणितप, 2 लघु सर्वतोभद्र तप, 65 सिद्धितप व करीब 50 अट्ठाइया पूर्ण हो चुकी है। इसी के साथ मा. आदिश जितेंद्र चौरड़िया व श्रीमती गरिमा दिलीप श्रीश्रीमाल ने बड़े लक्ष्य के साथ आज 19 उपवास व श्रीमती प्रिया दिपेश शाहजी, कमलेश बाबूलालजी छाजेड़, निकुंज रंजन गादिया के 11उपवास के प्रत्यख्यान ग्रहण किये। इसी के साथ श्रीमती पुखराज सुरेश व्होरा व श्रीमती श्रेया शैलेश कांकरिया के 112 दिन की श्रेणितप रूप उग्र तपस्या व श्रीमती किरण कमलेश छाजेड़ व श्रीमती पुष्पा पगारिया के 100 दिन की लघु सर्वतोभद्र तप की तपस्या गतिमान है। थांदला श्रीसंघ सहित अनेक संस्था व परिवार तपस्वियों का बहुमान कर रहे है तो तपस्वी परिवार तप महोत्सव व हर्ष मनाते हुए चौवीसी प्रभावना का लाभ ले रहे है। ऐसा ही एक अवसर आया जब श्रीमती पुष्पा अमृतलाल चौपड़ा की पौती रुपाली मनीष चौपड़ा की लाड़ली बिटिया नन्ही दिविशा ने 11 दिन तक निराहार रहकर उग्र तपस्या पूर्ण की। दिविशा के पहले उग्र तप से जहाँ परिवार में उत्साह का माहौल है वही नवयुवक मण्डल, बालिका मण्डल व अणु बाल मण्डल ने दिविशा के निवास स्थान से स्थानक भवन तक गुरुभगवंतों के साथ तपस्वी के जयकारों के गगन भेदी नारें लगाते हुए जयकार यात्रा निकाली। स्थानक भवन पर गुरुभगवंतों के मंगल प्रवचन हुए जिसमें पूज्य श्री संयतमुनिजी ने अन्तराय कर्म के 5 भेद में भोगान्तराय पर विस्तृत विवेचन फरमाते हुए कहा कि हमनें किसी भी जीव के भोग में व्यवधान उत्पन्न किया तो समझना हमने भोगान्तराय कर्म का बंध कर लिया फिर जिस प्रकार प्रथम तीर्थंकर भगवान को भी संयम मार्ग पर 12 माह से ज्यादा समय तक आहार नही मिला वैसी स्थिति हमारी भी हो सकती है। उन्होंनें दिविशा की तपस्या का उल्लेख करते हुए कहा कि दिविशा ने चोपड़ा परिवार में तपस्या का खाता खोल दिया है जिससे परिवार बहुत हर्षित है। पूज्य श्री आदित्यमुनिजी ने भी मंगल प्रवचन फरमाते हुए जीव को धर्म के सम्मुख लाने में पाप भीरुता रूप गुण का विस्तृत विवेचन फरमाते हुए कहा कि कोई भी जीव डरना पसंद नही करता उसे पाप से ज्यादा साँप व उसके जहर से डर लगता है लेकिन जहर एक भव का ही हरण करता है जबकि पाप तो अनेक भव बिगाड़ देता है इसलिए पाप भीरुता कायरता नही अपितु साहसिक कार्य होता है। यही जीव को निर्भीक भी बनाता है। धर्म सभा में तपस्वियों की जयकारों के साथ दिविशा का तप की बोली लगाकर बहुमान किया गया जिसका लाभ 8 उपवास के साथ दिविशा के रिश्तेदार ने 8 उपवास की भावना व्यक्त लिया। संचालन संघ सचिव प्रदीप गादिया ने किया उक्त जानकारी संघ प्रवक्ता पवन नाहर ने दी।